बीमा और फाइनेंस कंपनियों की शह पर अवैध पंजीयन...!

*स्लीपर कोच बसों का काला खेल*

बीमा और फाइनेंस कंपनियों की शह पर अवैध पंजीयन...!

*_एआरटीओ बना भ्रष्टाचार का अड्डा_*

#Hardoi

शहर सहित प्रदेश भर में स्लीपर कोच बसों का अवैध संचालन लगातार जानलेवा साबित हो रहा है। बसों के अंदर नियम विरुद्ध तीन फीट अतिरिक्त लंबाई बढ़ाकर बनाए गए शयनयान ढांचे न केवल कानून का उल्लंघन,बल्कि यात्रियों की जान के साथ खुला खिलवाड़ भी हैं।

सवाल यह है कि जब ये बसें अवैध हैं, तो फिर उनका बीमा, फाइनेंस और पंजीयन कैसे हो रहा है? इस पूरे तंत्र में परिवहन विभाग के साथ बीमा और फाइनेंस कंपनियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बीमा कंपनियां और फाइनेंस संस्थाएं अपनी वैधानिक जिम्मेदारी निभातीं,तो देश-प्रदेश में स्लीपर कोच बसों का इतना व्यापक और अनियंत्रित प्रसार संभव ही नहीं होता।

नियमों के अनुसार किसी भी वाहन में संरचनात्मक बदलाव अवैध है। इसके आवजूद स्लीपर बसों में अंदर से लंबाई और डिजाइन बदले जाते हैं, जिसे नजर अंदाज कर बीमा और फाइनेंस उपलब्ध कराया जा रहा है।

*संभाग स्तर पर जवाबदेही तय क्यों नहीं?*

नियमों के अनुसार ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के आदेशों के पालन की जिम्मेदारी संभागीय और क्षेत्रीय परिवहन कार्यालयों की होती है। सवाल यह है कि आदेशों के बाद कितनी कार्रवाई हुई, कितनी स्लीपर बसें जब्त या बंद की गईं, इसका कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड क्यों नहीं है?

*नुकसान में सिर्फ यात्री*

इस पूरे खेल में फाइनेंस कंपनी ब्याज वसूल लेती है, बीमा कंपनी प्रीमियम कमा लेती है, बस मालिक यात्रियों से अधिक किराया वसूलता है, लेकिन दुर्घटना होने पर आम यात्री अपनी जान गंवाता है या अधूरा मुआवजा पाता है।

*ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं*

रहवासियों की मांग कि जो हो चुका है उस पर आत्ममंथन हो, दोषियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए तथा भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएं। इस मुद्दे पर साफ तौर पर कहा गया है कि अवैध स्लीपर बसों का संचालन केवल एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे राज्य के परिवहन तंत्र से जुड़ा गंभीर घोटाला है।