वर्तमान में जीएं, और पुरानी बातों से परेशान न हों...श्री श्री रविशंकर

'शिवोत्सव' महासत्संग; श्रीगंगानगर पहुंचे श्रीश्री ने बताई जीने की कला

श्रीगंगानगर। हनुमानगढ़ रोड स्थित बीडीआईएस प्रांगण में आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर का भव्य सत्संग आयोजित हुआ। कार्यक्रम में दूर-दराज से बड़ी संख्या में हजारों श्रद्धालु आयोजन में उपस्थित हुए । बीडीआईएस के प्रांगण में श्रद्धालुओं के स्वागत और सुविधा के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी। भारती शिक्षण समिति के पदाधिकारी, प्राचार्य और स्टाफ ने आये सभी लोगों का उत्साहपूर्ण स्वागत किया। मीडिया प्रभारी आकाश गुम्बर ने बताया कि श्री श्री रविशंकर ने सत्संग में प्रेम, भक्ति और शिव चेतना पर गहन प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि बच्चे की नजर में प्रेम सहज रूप से दिखाई देता है और मुस्कान में भी तनाव झलक सकता है। मन को तनावमुक्त रखने के लिए प्राणायाम सबसे सरल और प्रभावी उपाय है। संत ने उपस्थित श्रद्धालुओं को ध्यान और योग अपनाने की सलाह दी। ज्योतिर्लिंग पर विस्तार से बताया कि आज सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के प्रकट होने के एक हजार वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब यह प्राचीन धरोहर टूट गई थी, तब लगभग 50 हजार लोग शहीद हुए। शिवलिंग के टूटे अंशों को पोटली में सुरक्षित रखा गया और इसी से प्रथम ज्योर्तिलिंग की पुनर्स्थापना हुई। जियोलॉजी विशेषज्ञों ने भी इसकी संरचना अद्भुत और रहस्यमयी बताई। संतों ने इसे वर्षों तक गुप्त रखा और कहा कि 'भारत जब आजाद होगा, राम मंदिर बनेगा, तब इसे सार्वजनिक किया जाएगा।' गुरु के सान्निध्य का महत्व पर संत ने कहा कि गुरु गांव और शहरों में इसलिए आते हैं कि वे भक्तों की परेशानियाँ हल्का कर सकें। गुरु का सान्निध्य मन का बोझ कम करता है और यह उसका सबसे बड़ा गुण है। श्रद्धालुओं में पहली बार पहुंचे श्रीश्री रविशंकर के प्रति व्यापक सम्मान देखने को मिला। श्री श्री ने कहा कि शिव के साथ नाता जोड़ना ही ध्यान है और शिव में तल्लीन होना भक्ति की पराकाष्ठा है। उन्होंने बताया कि कण-कण में शिव है और अपने भीतर शिव को देखना ही ध्यान का वास्तविक मार्ग है। साथ ही गुरु ने मन की प्रकृति पर प्रकाश डालते हुए बताया-मन हमेशा नई चीज चाहता है, जबकि दिल पुराने संबंधों में गर्व पाता है। रिश्ते दिमाग से नहीं, दिल से बनते हैं। यही कारण है कि प्रीत शब्द की जड़ राजस्थान से मानी जाती है। संत ने सरल जीवन के लिए कुछ महत्वपूर्ण सूत्र बताएः परिस्थितियां कैसी भी हों मन को स्थिर रखें, सभी समान दृष्टि से देखें, दूसरों की भूलों पर सवाल न करें क्षमा भाव रखें, वर्तमान में जीवन जिएं और पुरानी बातों से परेशान न हों। उन्होंने कहा कि को , शिव चेतना-भक्ति, ध्यान और सौंदर्य का मार्ग पर कहा कि सत्यम, शिवम, सुन्दरम ये तीनों जीवन के आधार हैं। बच्चों की निश्छलता पर चर्चा करते हुए संत ने कहा कि बच्चों में राग-द्वेष नहीं होता, यही गुण उन्हें सबसे प्यारा बनाता है और दूसरों से जोड़ता है।. आर्ट ऑफ लिविंग के पांच सिद्धांत पर विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि जीवन क्षणिक है। जिसके भीतर प्रेम नहीं, उसके पास शक्ति नहीं होती। भक्ति, शक्ति, प्रेम और युक्ति- यही चार पुरुषार्थ जीवन को पूर्ण करते हैं। प्रवचन के अंत में संत ने सभी को शिव चेतना के मार्ग पर चलने और प्रेम व सेवा को जीवन का मूल मंत्र बनाने का संदेश दिया। कार्यक्रम के मीडिया प्रभारी आकाश गुम्बर ने बताया कि महासत्संग में कलेक्टर डॉ. मंजू, श्री धर्मसंघ संस्कृत महाविद्यालय के प्रबंधक ब्रह्मचारी कल्याण स्वरूप महाराज, पंडित तनसुखराम शर्मा, डीआईजी परिस देशमुख, आर्ट ऑफ लिविंग की प्रथम शिक्षिका डॉ. मीतू शर्मा, भारती चेरिटेबल ट्रस्ट के सचिव अजय गुप्ता, कोषाध्यक्ष श्याम जैन, विकास सिहाग, सुरेंद्र ढाका, डॉ. मोहित टांटिया, सुनील अग्रवाल, विधायक डूंगरराम गेदर, पूर्व सांसद निहालचंद मेघवाल आदि ने श्रीश्री रविशंकर को शॉल व फूल मालाएं पहनाकर स्वागत किया। इस दौरान आर्ट ऑफ लिविंग की टीम ने श्रीश्री रविशंकर को राजशाही पगड़ी पहनाई । बीडीआईएस संस्थान का , राजेश जैन और डॉ. मोहित टाटिया का सम्मान भी किया गया। श्रद्धालुओं ने पुष्प वर्षा कर संत का अभिनंदन किया और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण होकर सत्संग से विदा लिया।