राज्यसभा का रास्ता दलितों के लिए इतना कठिन क्यों?


जब-जब दलित नेतृत्व आगे बढ़ा, रास्ते में खड़ी हो गईं नई बाधाएं रू सागर सिंह तोमर


फोटो नं0 106 कांग्रेस नेता सागर सिंह तोमर

अलीगढ़। राज्यसभा में दलित प्रतिनिधित्व को लेकर कांग्रेस नेता सागर सिंह तोमर ने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि देश की राजनीति में दलित समाज के नेताओं को आज भी सर्वोच्च राजनीतिक मंचों तक पहुंचने के लिए अपेक्षाकृत अधिक संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जब भी किसी दलित नेता के राज्यसभा या अन्य महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों तक पहुंचने की संभावना बनती है, तब किसी न किसी रूप में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं, जिससे उनकी राह मुश्किल हो जाती है।सागर सिंह तोमर ने कहा कि हाल ही में मध्यप्रदेश की वरिष्ठ कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा भेजे जाने की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में तेज थीं। पार्टी नेतृत्व की ओर से भी उनके नाम पर गंभीरता से विचार किए जाने की बातें सामने आ रही थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि यदि उनका नामांकन स्वीकार हो जाता तो उनकी जीत की संभावना मजबूत थी। लेकिन नामांकन प्रक्रिया में ही उनका पर्चा खारिज हो गया। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जब किसी दलित समाज की महिला को संसद के उच्च सदन तक पहुंचने का अवसर मिलता दिखाई देता है तो उसके सामने इतनी बड़ी बाधाएं क्यों खड़ी हो जाती हैं।
उन्होंने कहा कि यह पहली बार नहीं है जब दलित समाज के किसी प्रतिनिधि के राज्यसभा पहुंचने की राह में रुकावट आई हो। वर्ष 2018 का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि उस समय बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी एक दलित उम्मीदवार को राज्यसभा भेजने का प्रयास किया था। राजनीतिक समीकरण उम्मीदवार के पक्ष में दिखाई दे रहे थे और जीत की संभावना भी प्रबल मानी जा रही थी, लेकिन अंतिम समय में हुई क्रॉस वोटिंग ने पूरा परिदृश्य बदल दिया। परिणामस्वरूप वह उम्मीदवार राज्यसभा नहीं पहुंच सका।तोमर ने कहा कि यदि एक-दो बार ऐसी घटनाएं होती हैं तो उन्हें राजनीतिक संयोग माना जा सकता है, लेकिन जब बार-बार एक ही वर्ग के नेताओं के साथ ऐसी परिस्थितियां बनती हैं तो यह व्यापक चर्चा और विश्लेषण का विषय बन जाता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल चुनाव जीतने या हारने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि किस वर्ग, समुदाय और सामाजिक पृष्ठभूमि के लोगों को निर्णय लेने वाले मंचों तक पहुंचने का अवसर दिया जा रहा है।उन्होंने कहा कि आज भी देश में सामाजिक न्याय, समान अवसर और राजनीतिक भागीदारी की बातें की जाती हैं, लेकिन जब इन सिद्धांतों को व्यवहार में लागू करने का समय आता है तो कई बार स्थिति अलग दिखाई देती है। दलित समाज के नेताओं को स्थानीय राजनीति से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक अपनी जगह बनाने के लिए कई अतिरिक्त चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार संगठनात्मक स्तर पर, तो कई बार राजनीतिक समीकरणों के माध्यम से उनके सामने ऐसी परिस्थितियां खड़ी हो जाती हैं, जिनसे उनकी राजनीतिक यात्रा प्रभावित होती है।सागर सिंह तोमर ने कहा कि विभिन्न राजनीतिक दलों के भीतर ऐसी लॉबियों की चर्चा समय-समय पर होती रही है जो सत्ता और प्रतिनिधित्व के पारंपरिक ढांचे में बदलाव नहीं चाहतीं। उनका मानना है कि जब भी दलित समाज का कोई प्रभावशाली, शिक्षित और जनाधार वाला चेहरा उभरता है, तब उसके सामने नए अवरोध खड़े कर दिए जाते हैं। इससे न केवल उस व्यक्ति की राजनीतिक प्रगति प्रभावित होती है, बल्कि समाज के एक बड़े वर्ग की आकांक्षाओं को भी ठेस पहुंचती है।उन्होंने कहा कि संविधान निर्माता भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जिस सामाजिक समानता और राजनीतिक भागीदारी की परिकल्पना की थी, उसे पूरी तरह साकार करने के लिए केवल आरक्षण या संवैधानिक प्रावधान ही पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यकता इस बात की भी है कि राजनीतिक दल अपने संगठन और प्रतिनिधित्व की संरचना में सामाजिक विविधता को वास्तविक रूप से स्थान दें। राज्यसभा, विधानसभा, लोकसभा और अन्य महत्वपूर्ण मंचों पर सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित होना लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।तोमर ने कहा कि आज देश का दलित समाज शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, उद्योग और राजनीति सहित हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है। ऐसे में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक मंचों पर भी उसकी भागीदारी बढ़े। यदि बार-बार ऐसे अवसरों पर रुकावटें सामने आती हैं तो इससे कई तरह के प्रश्न जन्म लेते हैं, जिन पर राजनीतिक दलों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब समाज के हर वर्ग को उसकी योग्यता, क्षमता और जनसमर्थन के आधार पर आगे बढ़ने का समान अवसर मिलेगा। राजनीतिक प्रतिनिधित्व किसी एक वर्ग या समूह तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसमें भारत की सामाजिक विविधता स्पष्ट रूप से दिखाई देनी चाहिए। राज्यसभा जैसे महत्वपूर्ण सदन में दलित समाज की प्रभावी भागीदारी केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक संतुलन का भी प्रश्न है।