पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे ने संजोई रेल विरासत की अनमोल धरोहर, 112 साल पुराने स्टीम इंजन 808-सी को मिला नया जीवन

पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे ने संजोई रेल विरासत की अनमोल धरोहर, 112 साल पुराने स्टीम इंजन 808-सी को मिला नया जीवन

मालीगांव स्थित एनएफआर मुख्यालय में आकर्षण का केंद्र बना ऐतिहासिक विरासत इंजन

मालीगांव। भारतीय रेलवे की गौरवशाली विरासत को सहेजने की दिशा में एक ऐतिहासिक और सराहनीय पहल करते हुए पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (एनएफआर) ने दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे (डीएचआर) के 112 वर्ष पुराने ऐतिहासिक स्टीम इंजन संख्या 808-सी का सफलतापूर्वक नवीनीकरण कर उसे नया जीवन दिया है। अब यह शानदार विरासत इंजन मालीगांव स्थित एनएफआर मुख्यालय परिसर में आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित आकर्षक विरासत प्रदर्शनी के रूप में स्थापित किया गया है।इस ऐतिहासिक विरासत इंजन का उद्घाटन 26 मई 2026 को पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे के महाप्रबंधक चेतन कुमार श्रीवास्तव ने वरिष्ठ अधिकारियों एवं कर्मचारियों की उपस्थिति में किया। उद्घाटन के दौरान उपस्थित लोगों ने भारतीय रेलवे की इस अनमोल धरोहर को नए स्वरूप में देखकर खुशी व्यक्त की।वर्ष 1914 में निर्मित यह ऐतिहासिक स्टीम इंजन ब्रिटेन की प्रसिद्ध नॉर्थ ब्रिटिश लोकोमोटिव कंपनी लिमिटेड, ग्लासगो द्वारा बनाया गया था। यह इंजन भारतीय रेलवे की इंजीनियरिंग उत्कृष्टता और गौरवशाली इतिहास का जीवंत प्रतीक माना जाता है। वर्षों तक सेवा देने के बाद यह इंजन पहले से एनएफआर मुख्यालय परिसर में प्रदर्शित था, लेकिन अब इसके व्यापक नवीनीकरण, मरम्मत और आकर्षक पेंटिंग कार्य के बाद इसे बिल्कुल नया रूप दिया गया है।महाप्रबंधक चेतन कुमार श्रीवास्तव के मार्गदर्शन और प्रेरणा में यह विशेष जीर्णोद्धार कार्य न्यू बंगाईगांव स्थित कैरेज एंड वैगन कारखाने द्वारा किया गया। नवीनीकृत इंजन को आधुनिक सजावटी रोशनी, वास्तविक धुएं और साउंड इफेक्ट्स से लैस किया गया है, जिससे यह दर्शकों और रेल प्रेमियों के लिए बेहद आकर्षक बन गया है।रेलवे अधिकारियों के अनुसार, यह इंजन प्रसिद्ध 4-6-2 पैसिफिक क्लास स्टीम लोकोमोटिव श्रेणी से संबंधित है और वर्ष 1914 में दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे के अंतर्गत सेवा में शामिल किया गया था। अपने जुड़वां इंजन संख्या 807 के साथ इस इंजन ने किशनगंज विस्तार खंड पर भारी मालगाड़ियों को खींचने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। बाद में 1948 में लाइन को मीटर गेज में परिवर्तित किए जाने के बाद भी इस इंजन ने लंबे समय तक अपनी सेवाएं दीं।यह संरक्षित विरासत इंजन आज भी भारतीय रेलवे के स्वर्णिम स्टीम युग और तकनीकी उत्कृष्टता की याद दिलाता है। एनएफआर द्वारा किया गया यह संरक्षण कार्य न केवल ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय रेलवे के गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का भी प्रेरणादायक प्रयास है।रेलवे प्रेमियों और कर्मचारियों ने पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस प्रकार के प्रयास देश की रेल विरासत को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।