सियालदह मंडल ने इको-फ्रेंडली बायोगैस पहल से हासिल की ‘जीरो वेस्ट’ उपलब्धि, नारकेलडांगा में शुरू हुआ अत्याधुनिक प्लांट

कोलकाता। पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में सियालदह मंडल ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। "जीरो वेस्ट" प्रबंधन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सियालदह मंडल ने नारकेलडांगा में अत्याधुनिक बायोगैस प्लांट का सफलतापूर्वक संचालन शुरू कर दिया है। यह पर्यावरण-अनुकूल अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली फिलहाल परीक्षण चरण में है, लेकिन इसके माध्यम से प्रतिदिन बड़ी मात्रा में जैविक कचरे को ऊर्जा में बदला जा रहा है।

रेलवे अधिकारियों के अनुसार यह प्लांट प्रतिदिन करीब 250 किलोग्राम जैविक कचरे के प्रसंस्करण के लिए तैयार किया गया है। यह कचरा मुख्य रूप से आरपीएफ मेस, नारकेलडांगा कॉलोनी और सियालदह स्टेशन से एकत्र किया जाता है। इस संयंत्र में अवायवीय अपघटन (Anaerobic Digestion) प्रक्रिया के जरिए खाद्य अपशिष्ट, सब्जियों के छिलके और अन्य जैविक कचरे को 10 से 12 किलोग्राम मीथेन युक्त बायोगैस में बदला जा रहा है। यह गैस पारंपरिक ईंधन का एक टिकाऊ और पर्यावरण हितैषी विकल्प साबित हो रही है।

इस बायोगैस संयंत्र की विशेषता यह है कि इसमें सुव्यवस्थित और बिना दुर्गंध वाली प्रक्रिया अपनाई गई है। सबसे पहले कचरे की प्री-प्रोसेसिंग कर उसे महीन गूदे में बदला जाता है। इसके बाद पानी मिलाकर स्लरी तैयार की जाती है, जिसे वायुरुद्ध डाइजेस्टर टैंक में भेजा जाता है। यहां विशेष बैक्टीरिया ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में जैविक पदार्थ को तोड़कर गैस उत्पन्न करते हैं।

इस प्रक्रिया से दो महत्वपूर्ण उत्पाद प्राप्त होते हैं। पहला, रसोई में उपयोग के लिए नवीकरणीय बायोगैस ईंधन और दूसरा, कॉलोनी के बगीचों एवं हरित क्षेत्रों के लिए तरल जैविक खाद। इससे एलपीजी खर्च में कमी के साथ-साथ उर्वरक पर होने वाला खर्च भी घट रहा है।

रेलवे के अनुसार यह परियोजना सर्कुलर इकॉनमी के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के अनुरूप है। प्रतिदिन 250 किलोग्राम जैविक कचरे को लैंडफिल में जाने से रोककर सियालदह मंडल अपने कार्बन फुटप्रिंट को काफी हद तक कम कर रहा है और 100 प्रतिशत प्राकृतिक कचरा प्रबंधन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

रेलवे अधिकारियों का कहना है कि यह पहल सियालदह मंडल की हरित प्रौद्योगिकी को रेलवे संचालन में शामिल करने की रणनीति को दर्शाती है। इस परियोजना के माध्यम से कचरा अब बोझ नहीं, बल्कि एक उपयोगी संसाधन बनकर सामने आया है।