बंदूक और कलम का संगम: सीआरपीएफ के डीआईजी राकेश कुमार सिंह ने लिखीं 11 पुस्तकें, दो पर मिला राष्ट्रीय सम्मान

बंदूक और कलम का संगम: सीआरपीएफ के डीआईजी राकेश कुमार सिंह ने लिखीं 11 पुस्तकें, दो पर मिला राष्ट्रीय सम्मान

चंदौली/वाराणसी। देश सेवा के लिए हाथ में बंदूक थामने वाले एक अधिकारी ने जब कलम उठाई, तो शब्दों की ऐसी धारा बह निकली कि साहित्य जगत भी उनका कायल हो गया। हम बात कर रहे हैं सीआरपीएफ में डीआईजी पद पर तैनात राकेश कुमार सिंह की, जिन्होंने अपने कर्तव्य और जुनून के बीच संतुलन बनाते हुए अब तक 11 पुस्तकें लिख डाली हैं। उनकी दो पुस्तकों को भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित भी किया जा चुका है।

राकेश कुमार सिंह ने वर्ष 1991 में सुरक्षा बलों में शामिल होकर देश सेवा की राह चुनी। कठिन परिस्थितियों, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ड्यूटी और लगातार मानसिक दबाव के बीच उन्होंने अपने अनुभवों को शब्दों में ढालना शुरू किया। उन्होंने बताया कि एक जवान की जिंदगी केवल वर्दी और हथियार तक सीमित नहीं होती, बल्कि उसके पीछे संघर्ष, त्याग और भावनाओं की गहरी कहानी छिपी होती है। इन्हीं अनुभवों को उन्होंने अपनी पुस्तकों में बखूबी उतारा है।

उन्होंने कहा कि ड्यूटी के दौरान जब भी थोड़ा समय मिलता, तो वे बंदूक को एक तरफ रखकर कागज-कलम उठा लेते और अपने अनुभवों को लिखना शुरू कर देते। धीरे-धीरे यह आदत जुनून में बदल गई और देखते ही देखते उन्होंने 11 पुस्तकों का लेखन कर डाला। खास बात यह है कि नक्सल आंदोलन पर आधारित उनकी दो पुस्तकों को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके लेखन की गंभीरता और प्रामाणिकता को दर्शाता है।

मुठभेड़ के अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जब जवान ऑपरेशन में होते हैं, तो उनका पूरा ध्यान केवल मिशन पर होता है। उस समय भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती, केवल लक्ष्य होता है?देश की सुरक्षा और दुश्मन का खात्मा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुठभेड़ के दौरान जवान सिर्फ ?बंदूक की भाषा? समझते हैं, जहां निर्णय पल भर में लेना होता है।

हालांकि, इस कठोर जीवन के बीच भी उन्होंने मानवीय संवेदनाओं को जिंदा रखा और उन्हें अपनी लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्त किया। उनकी किताबें न केवल सुरक्षा बलों के जीवन की झलक देती हैं, बल्कि आम लोगों को भी यह समझने का अवसर देती हैं कि देश की सुरक्षा में लगे जवान किन परिस्थितियों से गुजरते हैं।

राकेश कुमार सिंह की यह यात्रा युवाओं के लिए प्रेरणा है कि विपरीत परिस्थितियों में भी अपने भीतर के हुनर को पहचानकर उसे निखारा जा सकता है। बंदूक और कलम के इस अनोखे संगम ने यह साबित कर दिया है कि एक सैनिक सिर्फ योद्धा ही नहीं, बल्कि संवेदनशील लेखक भी हो सकता है।