भक्तिमय हुई विदिशा की फिजा: गंधर्व बिहार फार्म हाउस में ओशो प्रेमियों ने मनाया 'महाजागरण' का पर्व


​विदिशा से शोभित जैन की रिपोर्ट

अध्यात्म और भक्ति की नगरी विदिशा में शनिवार को एक अपूर्व दृश्य देखने को मिला। अवसर था महान दार्शनिक और युगदृष्टा ओशो के 'संबोधि दिवस' का, जिसे ओशो प्रेमियों द्वारा उदयगिरि रोड स्थित गंधर्व विहार (सुनील जैन कृषि फार्म) में अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। प्रातः काल से ही आश्रम का वातावरण सुगंधित और ओशो प्रेमियों के 'अहोभाव' से सराबोर नजर आया।

​संबोधि की ऐतिहासिक यात्रा का वृत्तांत

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता, अखिल भारतीय स्वर्णकार महासभा के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी एवं लायंस क्लब के पूर्व अध्यक्ष लायन अरुण कुमार सोनी ने ओशो के जीवन के उस महत्वपूर्ण मोड़ का भावपूर्ण वर्णन किया, जब उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उन्होंने बताया, "21 मार्च 1953 का वह दिन मनुष्य जाति के इतिहास में स्वर्णिम है। संबोधि प्राप्ति से पूर्व ओशो गहरे मानसिक तनाव और अशांति से गुजर रहे थे। जब रात में उन्हें नींद नहीं आई, तो वे जबलपुर के भंवरताल पार्क में एक मौलश्री वृक्ष के नीचे जा बैठे। जैसे ही उनके भीतर का 'कर्ता भाव' यानी अहंकार मिटा, उन्हें परम सत्य की उपलब्धि हुई।"

​विभिन्न आध्यात्मिक गतिविधियों का आयोजन

उत्सव का शुभारंभ प्रातः 7:00 बजे ओशो के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात निम्नलिखित सत्र आयोजित किए गए:
​सक्रिय ध्यान (Dynamic Meditation): शरीर और मन के विरेचन के लिए संगीत की धुन पर साधकों ने ध्यान किया।

​कीर्तन और भजन: ओशो प्रेमियों ने ढोलक और मंजीरों की थाप पर नृत्य करते हुए प्रभु भक्ति का आनंद लिया।

​साक्षी भाव पर प्रवचन: श्री सोनी ने ओशो के 'साक्षी भाव' (Witnessing) के सूत्र को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि हमें अपने विचारों को एक तटस्थ दर्शक की तरह देखना चाहिए, बिना किसी प्रतिक्रिया के। यही बुद्धत्व का मार्ग है।

​ओम ध्यान और मौन: कार्यक्रम का समापन गहरे मौन और शांति के साथ हुआ।

कार्यक्रम के समापन पर आभार व्यक्त भाई पंकज आचार्य द्वारा किया गया। विदिशा के सभी ओशो संन्यासियों और नगर वासियों ने इस सफल आयोजन के लिए आयोजकों की सराहना की। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी जनों ने सामूहिक प्रसाद ग्रहण कर इस आध्यात्मिक उत्सव का समापन किया।