आधुनिकता के दौर में भी प्रासंगिक है प्रभाती और लोरी साहित्यकारों ने बताया चारित्रिक विकास का आधार


​विदिशा से शोभित जैन की रिपोर्ट

| स्थानीय महाराणा प्रताप महाविद्यालय में 'बाल साहित्य शोध सृजनपीठ' के तत्वावधान में एक गरिमामय वैचारिक विमर्श और काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। साहित्य अकादमी के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का मुख्य विषय 'शिशु मन के मानस संस्कारों पर प्रभाती और लोरी का प्रभाव' रहा। कार्यक्रम में शिक्षाविदों और कवियों ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिकता के दौर में भी बच्चों के चारित्रिक विकास के लिए हमारी पारंपरिक लोरियां और प्रभातियां सबसे सशक्त माध्यम हैं।

संस्कारों की पहली पाठशाला है लोरी

बाल साहित्य शोध सृजनपीठ की निदेशक डॉ. मीनू पाण्डेय ने अपने मुख्य व्याख्यान में कहा कि एक सभ्य मानव समाज के निर्माण के लिए लोरी और प्रभाती ही मानक आधार हैं। उन्होंने विस्तार से समझाया कि कैसे ये ध्वनियां शिशु के अवचेतन मन पर गहरा संस्कारकारी प्रभाव डालती हैं। इसी क्रम में डॉ. अनीता तिवारी और डॉ. रंजना शर्मा ने भी अपने विचार साझा करते हुए कहा कि ममता भरी लोरी से मिलने वाली सुरक्षा की भावना बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करती है।

​विद्वानों का व्याख्यान और संबोधन

सत्र के दौरान कमलेश बहादुर सिंह ने विषय पर सारगर्भित व्याख्यान दिया, जबकि यशवंत प्रताप सिंह राठौर ने अपनी विशेष प्रस्तुति से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम में रेखा दुबे और राजेंद्र श्रीवास्तव ने भी अपने संबोधन के माध्यम से बाल साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला। पूरे कार्यक्रम का कुशल समन्वय ध्रुव शर्मा द्वारा किया गया।
​काव्य धारा से सजी शाम
दूसरे सत्र में आयोजित काव्य पाठ ने समां बांध दिया। बाल कवि अनुज भार्गव और शिखा रघुवंशी के साथ-साथ अमन शर्मा और पवन प्रबल ने अपनी कविताओं के माध्यम से लोरी के महत्व को रेखांकित किया। कमलेश बंसल और नैना शर्मा ने भी अपनी सुंदर रचनाओं का पाठ किया। इस सत्र का सफल संचालन सतेंद्र सत्यज ने किया। लायन अरुण कुमार सोनी द्वारा विषय पर विचार व्यक्त करते हुए चार लाइन का काव्य पाठ किया गया जिसकी सभी ने प्रशंसा की।

​आभार प्रदर्शन

कार्यक्रम के समापन पर उपस्थित सभी अतिथियों, वक्ताओं और श्रोताओं का आभार लायन राजकुमार सर्राफ प्रिंस द्वारा किया गया । उन्होंने इस सफल आयोजन के लिए सभी सहयोगियों का धन्यवाद किया।