सायरन बजाती एंबुलेंस और बेपरवाह लोग: कब जागेगी सड़क पर चलने वालों तथा पुलिस की संवेदनशीलता?

सायरन बजाती एंबुलेंस और बेपरवाह लोग: कब जागेगी सड़क पर चलने वालों तथा पुलिस की संवेदनशीलता?

चंदौली। उत्तर प्रदेश, शहरों और कस्बों की सड़कों पर एक दर्दनाक और चिंताजनक तस्वीर अक्सर देखने को मिलती है। ट्रैफिक जाम के बीच एक एंबुलेंस सायरन बजाती हुई रास्ता बनाने की कोशिश करती रहती है, लेकिन आगे खड़े वाहन और सड़क किनारे लापरवाही से खड़ी गाड़ियां उसके रास्ते में दीवार बन जाती हैं।

एंबुलेंस का सायरन लगातार गूंजता रहता है, मगर लोगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। यहां तक कि पुलिस की भूमिका भी इसमें निष्क्रिय ही देखी गई है। ऐसा ही मंज़र शुक्रवार को चंदौली जिला मुख्यालय पर स्थित पं कमला पति त्रिपाठी राजकीय जिला अस्पताल के सामने देखने को मिला।

कि सड़क पर जाम लगा है। दो एंबुलेंस मरीजों को लेकर जाम में फंसी हैं, लगातार सायरन बज रहा है। लेकिन उन्हें रास्ता देने के लिए कोई भी होटने को तैयार नहीं है। खास बात यह देखी गई कि कोई पुलिस कर्मी भी वहां मौजूद नहीं रहा।

दरअसल, सड़कों पर अव्यवस्थित ढंग से वाहन खड़ा करने और ट्रैफिक नियमों की अनदेखी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। लोग दुकान के सामने या सड़क के किनारे कहीं भी बाइक या कार खड़ी कर देते हैं, जिससे सड़क संकरी हो जाती है और जाम लग जाता है। ऐसे में जब कोई एंबुलेंस मरीज को लेकर अस्पताल की ओर दौड़ रही होती है, तो उसे भी उसी जाम में फंसना पड़ता है।स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गंभीर मरीजों के लिए हर मिनट बेहद कीमती होता है।

यदि समय पर अस्पताल पहुंच जाए तो कई बार मरीज की जान बचाई जा सकती है, लेकिन रास्ते में लगने वाला जाम और लोगों की लापरवाही किसी की जिंदगी पर भारी पड़ जाती है।

विडंबना यह है कि जब कोई नेता, मंत्री या वरिष्ठ अधिकारी का काफिला गुजरता है, तो कुछ ही मिनटों में सड़कें खाली करा दी जाती हैं। पुलिस और प्रशासन सक्रिय हो जाता है और देखते ही देखते वीआईपी वाहनों का काफिला फर्राटा भरते हुए निकल जाता है। लेकिन जब बात एंबुलेंस की आती है, तो अक्सर वह तत्परता और व्यवस्था दिखाई नहीं देती। कई बार ट्रैफिक पुलिस की निष्क्रियता भी सवालों के घेरे में रहती है। एंबुलेंस के सायरन के बावजूद जाम में फंसे वाहनों को हटाने के लिए तुरंत कार्रवाई नहीं हो पाती, जिससे एंबुलेंस को आगे बढ़ने में अनावश्यक देरी होती है।दरअसल एंबुलेंस में बैठा मरीज कोई भी हो सकता है?किसी का पिता, मां, भाई, बहन या बच्चा। यदि समाज के लोग थोड़ी संवेदनशीलता दिखाएं और ट्रैफिक पुलिस भी तत्परता से व्यवस्था बनाए, तो कई अनमोल जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।

जरूरत इस बात की है कि सड़क पर चलते समय हर व्यक्ति यह समझे कि एंबुलेंस को रास्ता देना केवल कानून का पालन नहीं, बल्कि मानवता का सबसे बड़ा कर्तव्य है। क्योंकि एंबुलेंस का हर सायरन किसी की जिंदगी की आखिरी उम्मीद भी हो सकता है।