* गणेश जी सम्मानित विसर्जन सुनिश्चित नहीं :- राजेश्वरानंद *

नई दिल्ली, 17 सितंबर:

शाहदरा के गोरख पार्क स्थित श्री राज माता झंडे वाला मंदिर समूह में गणेश उत्सव के पावन संदर्भ में भक्तों को मार्गदर्शन देते हुए आध्यात्मिक मार्गदर्शक स्वामी राजेश्वरानंद राज गुरुजी महाराज ने गणेश विसर्जन की वर्तमान पद्धतियों पर एक गंभीर और क्रांतिकारी विचार साझा किया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि हम गणेश जी का सह-सम्मानित और सुरक्षित विसर्जन सुनिश्चित नहीं कर सकते, तो हमें उनकी स्थापना करने का भी कोई अधिकार नहीं है।

स्वामी जी ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हम गणेश जी को बड़े धूमधाम से स्थापित करते हैं, उनकी पूजा-अर्चना करते हैं, भोग लगाते हैं और भजन-कीर्तन करते हैं, लेकिन विसर्जन के समय हम उन्हें ऐसी दूषित नदियों या जल-स्रोतों में प्रवाहित कर देते हैं जहाँ हम अपने बच्चों को नहलाना या आचमन करना भी पसंद नहीं करते। इसके अलावा, विसर्जन के पश्चात मूर्तियाँ नदी के किनारों पर खंडित अवस्था में बिखर जाती हैं, जिन पर पशु-पक्षियों द्वारा मल-मूत्र त्यागने जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं, जिससे सनातन धर्म की आस्था और मर्यादा का अपमान होता है।

गणेश विसर्जन का पर्यावरण-अनुकूल और दिव्य विकल्प

इस धार्मिक और सामाजिक विसंगति से बचने के लिए स्वामी राजेश्वरानंद जी महाराज ने एक अत्यंत सुंदर, पवित्र और वैज्ञानिक मार्ग सुझाया है:

पारिवारिक या स्थानीय कुंड में विसर्जन: श्रद्धालुओं को चाहिए कि वे अपने घर के आँगन, गली-मोहल्ले, पार्क या किसी खुले मैदान में एक बड़ा पात्र (टब आदि) बनाकर उसमें स्वच्छ जल भरें।

पवित्र द्रव्यों का उपयोग: इस बड़े और सुंदर कुंड में दूध, शहद, इत्र, गुलाल और प्राकृतिक फूलों के साथ गणेश जी का सम्मानित विसर्जन किया जाना चाहिए।

प्रकृति और हरियाली को समर्पण: विसर्जन के पश्चात प्राप्त इस पवित्र जल को घर के पौधों, पार्कों और खेतों के पौधों में सींचना चाहिए।

पौधारोपण और जीवन का संदेश: विसर्जन में प्रयुक्त हुई मिट्टी से अपने घर पर ही एक पौधा लगाना चाहिए। इससे यह संदेश मिलता है कि गणेश जी हमारी आँखों के सामने पौधे के रूप में पल्लवित होकर हमें हरियाली, खुशहाली और जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान कर रहे हैं।

विसर्जन की पारंपरिक कमियों से बचाव के लाभ

स्वामी जी द्वारा सुझाए गए इस अनुकरणीय मार्ग को अपनाने से समाज और पर्यावरण को निम्नलिखित बहुमूल्य लाभ प्राप्त होंगे:

सुरक्षा एवं सुगमता: नदी या बड़े जलाशयों पर होने वाली दुर्घटनाओं, भगदड़ और जान-माल की हानि से पूरी तरह बचाव होगा।

यात्रा मार्ग और समय की बचत:~शहर के बड़े ट्रैफिक जाम और प्रशासनिक परेशानियों से राहत मिलेगी।

सद्पयोग: विसर्जन और आयोजनों में व्यर्थ होने वाले धन को बचाकर जरूरतमंदों की सहायता, गरीबों की सेवा और अन्य परोपकारी कार्यों में लगाया जा सकेगा।

धार्मिक गरिमा की रक्षा:~ सनातन परंपरा की पवित्रता अक्षुण्ण रहेगी और आस्था का अनादर होने से रुकेगा।

प्रबंधक राम वोहरा 9212325006