सरकारी एंबुलेंस बनी निजी अस्पतालों की ‘दलाली गाड़ी’,.... मरीजों की जान से खिलवाड़ और कमीशन का काला खेल.... मामला आमा तालाब रोड स्थित एक निजी अस्पताल का ....

Dhamtari.

आमा तालाब रोड , जनता के टैक्स के पैसों से गरीबों और जरूरतमंदों की जान बचाने के लिए चलाई जाने वाली सरकारी 108 और 102 , बेसिक लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस सेवा आज खुद एक बड़े रैकेट का जरिया बन चुकी है। यह सेवा अब मरीजों को अस्पताल पहुंचाने का पवित्र माध्यम नहीं, बल्कि कुछ भ्रष्ट चालकों और निजी अस्पतालों के बीच पनपे कमीशनखोरी के गठजोड़ की ?दलाली गाड़ी? बनकर रह गई है।

रविवार शाम करीब पांच बजे रुद्री गंगरेल मार्ग आमा तालाब रोड स्थित एक बड़े निजी अस्पताल के मुख्य द्वार पर जो कुछ हुआ, उसने इस व्यवस्था के भीतर सड़ चुके तंत्र की पोल खोल दी। वहां एक सरकारी एंबुलेंस आकर रुकी, जिससे बेसुध हालत में मरीजों को स्ट्रेचर पर उतारकर सीधे अस्पताल के भीतर ले जाया गया।  

यह कोई इकलौता या अचानक हुआ वाकया नहीं है। इलाके के लोग दबी जुबान से बताते हैं कि विगत सालों से यह एक खुला खेल बन चुका है। हर दूसरे-तीसरे दिन ऐसी तस्वीरें आम हो चली हैं, जहां सरकारी वाहनों का इस्तेमाल निजी क्लीनिकों / अस्पतालों की झोली भरने के लिए किया जा रहा है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, रविवार को भी इसी नामी निजी अस्पताल में एक मरीज को सरकारी एम्बुलेंस से लाकर भर्ती कराया गया ।

प्राप्त स्त्रोत बताते है गंभीर बात यह है कि इस खेल के तहत मरीजों और उनके परिजनों की मजबूरी का सौदा किया जाता है। जब कोई लाचार व्यक्ति मदद के लिए 108 या 102 पर फोन करता है, तो ये भ्रष्ट कर्मी मौके पर पहुंचकर डर और भ्रम का माहौल बनाते हैं। वे परिजनों को बरगलाते हुए कहते हैं कि सरकारी अस्पतालों में न तो बेड खाली हैं, न ही दवाइयां हैं और न ही कोई डॉक्टर मौजूद है। इसके बाद वे अपनी सेटिंग वाले महंगे निजी अस्पतालों का झांसा देकर मरीजों को सीधे वहां के बिलिंग काउंटर पर पहुंचा देते हैं। वहां इलाज के नाम पर गरीब परिवारों को लाखों रुपये के फर्जी बिल थमा दिए जाते हैं, जिससे कई परिवार कर्ज के दलदल में धंस जाते हैं।

इस अनैतिक और अवैध धंधे का सबसे बड़ा और भयानक खतरा प्रसूता महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार मरीजों पर मंडरा रहा है। कई मामलों में इन बेसहारा मरीजों को बिना किसी मान-मनौव्वल के फर्जी और निजी डॉक्टरों के हवाले कर दिया जाता है। इससे गत वर्ष 6 दिसंबर 2025 को करीब 12:00 बजे उक्त लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस गाड़ी मरीज लेकर उक्त निजी अस्पताल में पहुंचा था , लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के वीडियो बनाते ही एंबुलेंस चालक और उसके सहायक अपनी कारस्तानियों के पकड़े जाने के डर से आनन-फानन में गाड़ी समेत वहां से फरार हो गए।

अब सवाल यह उठता है कि जब हर सरकारी एंबुलेंस में जीपीएस ट्रैकर लगा है और हर आपातकालीन कॉल की रिकॉर्डिंग होती है, तब भी स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन आंखों पर पट्टी बांधकर क्यों बैठा है? क्या इस कमीशन के खेल के तार विभाग के भीतर बैठे कुछ सफेदपोशों तक जुड़े हुए हैं? आम जनता अब सड़कों पर उतरकर यह पूछने को मजबूर है कि यदि सरकारी तंत्र ही दलालों की तिजोरी भरने का साधन बन जाएगा, तो एक गरीब और लाचार मरीज आखिर कहां जाएगा?

यह पूरी घटना हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे में दीमक की तरह लगी उस व्यवस्था की कड़वी सच्चाई है, जो इंसानी जिंदगी से ज्यादा मुनाफे को अहमियत देती है। यदि समय रहते इस गंभीर मामले में लिप्त चालकों और निजी अस्पतालों के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच बैठाकर कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो वह दिन दूर नहीं जब इस लापरवाही के चलते किसी बड़े हादसे का सामना करना पड़ेगा। तब इसकी नैतिक और कानूनी जिम्मेदारी सिर्फ कुछ वाहन चालकों की नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की होगी।

उक्त आमा तालाब रोड स्थित निजी अस्पताल में पहले भी मरीजों को लूटने का मामला उजागर हुआ था लेकिन संचालक के अपने रसूख के चलते अधिकारियों ने समझाइश के साथ मामूली पेनाल्टी लगाई थी, जो अब ठंडे बस्ते में है।

इसी तरह के पुराने मामले की संज्ञान पहले भी सीएमएचओ और सिविल सर्जन, साथ ही बीएमओ के संज्ञान में लाया गया था जिसके बाद अधिकारी ने एम्बुलेंस चालक पर उचित कार्यवाही की गई थी, मामले को पुनः अधिकारियों के संज्ञान में लाया गया है हालांकि चारामा बीएमओ डा. शंखवार से सम्पर्क साधने की कोशिश की गई लिए उनसे संपर्क नहीं हो पाया, समाचार लिखे जाने तक संबंधितों का पक्ष नहीं आया है..... बहरहाल देखना होगा कि मामले में जिम्मेदार क्या कार्यवाही करते है या यूं ही सारी कागजी कार्यवाही को मरीजो के माथे मढ़ कर चालक और जिम्मेदार अधिकारी पर क्या कार्यवाही होगी..?.?.?.?.