यमुना उद्धार: बिना सहायक नदियों के संभव नहीं 

यमुना के अस्तित्व का सवाल अब सिर्फ दिल्ली-आगरा के प्रदूषण तक सीमित नहीं रहा। आगरा में एक बड़ी बैठक में साफ कहा गया - बिना सहायक नदियों को जीवित किए यमुना का उद्धार संभव नहीं है।

 

8 अक्टूबर 2026 को आगरा में यमुना नदी मित्र मंडलियों ने प्रख्यात नदी शोधार्थी और यमुना संरक्षण कार्यकर्ता स्वर्गीय मनोज मिश्र की 72वीं जयंती पर उन्हें याद किया। देहरादून से प्रयागराज तक की यमुना मित्र मंडलियों के प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए।

 

भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे मनोज मिश्र ने रिटायरमेंट के बाद अपने जीवन के 17 साल नदियों, खासकर यमुना के शोध और संरक्षण को दिए। दिल्ली में यमुना खादर को अतिक्रमण से बचाने में उनकी बड़ी भूमिका रही। उनके निधन के बाद पिछले साल दिल्ली में तय हुआ था कि उनका जन्मदिवस 'यमुना नदियां दिवस' के रूप में मनाया जाएगा। इस साल दूसरा यमुना नदियां दिवस आगरा में मनाया गया।

 

मनोज मिश्र मानते थे कि सहायक नदियों को जीवित किए बिना, पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित किए बिना और मशीनी रेत खनन पर रोक लगाए बिना यमुना का पुनर्जीवन संभव नहीं। इसी सोच पर बैठक में 8 बड़ी मांगें रखी गईं।

*मांग नंबर 1: यमुना में प्राकृतिक प्रवाह बहाल किया जाए।*

सहायक नदियों की उपेक्षा, अत्यधिक जल दोहन, बांधों और रेत खनन के कारण यमुना का प्राकृतिक प्रवाह बुरी तरह प्रभावित हुआ है। 1,376 किलोमीटर लंबी यमुना का लगभग आधा हिस्सा आज प्रवाहहीन और अत्यधिक प्रदूषित है। नदी को बारहमासी बनाए रखने के लिए उसके प्राकृतिक प्रवाह और सहायक नदियों को पुनर्जीवित किया जाए।

 

*मांग नंबर 2: बांधों और बैराजों से पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह छोड़ा जाए।*

यमुना बेसिन के बांधों और बैराजों से उपलब्ध जल का आदर्श रूप से 75 प्रतिशत हिस्सा नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी को बनाए रखने के लिए छोड़ा जाए। किसी भी स्थिति में यह मात्रा 50 प्रतिशत से कम न हो।

 

*मांग नंबर 3: नए बांधों के बजाय टिकाऊ जलापूर्ति विकल्प अपनाए जाएं।*

यमुना बेसिन में नए बांध बनाने से पहले कम खर्चीले और टिकाऊ विकल्पों पर विचार किया जाए। तालाबों का संरक्षण एवं पुनर्निर्माण, वर्षा जल संचयन और स्थानीय जल स्रोतों का पुनर्जीवन प्राथमिकता में हों।

 

*मांग नंबर 4: टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देकर जल दोहन और रासायनिक प्रदूषण घटाया जाए।*

यमुना बेसिन में पारंपरिक फसलों का क्षेत्र बढ़ाने और अत्यधिक जल तथा रसायनों पर निर्भर खेती को कम करने के लिए दीर्घकालिक योजना बनाई जाए। सिंचाई में जल दक्षता बढ़ाई जाए और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जाए।

 

*मांग नंबर 5: निर्माणाधीन और प्रस्तावित बांधों तथा नदी जोड़ परियोजनाओं की समीक्षा हो।*

यमुना बेसिन में अब तक 70 से अधिक छोटे-बड़े बांध और बैराज बन चुके हैं। इनसे नदी के प्रवाह पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। यमुना पर प्रस्तावित एवं निर्माणाधीन लखवाड़, किसाऊ, रेणुका, पचनद और मझगांव बांधों की पर्यावरणीय एवं सामाजिक प्रभावों के आधार पर पुनर्समीक्षा की जाए। साथ ही पार्वती-कालीसिंध-चंबल और केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजनाओं की भी व्यापक समीक्षा हो और यमुना के निचले हिस्सों पर पड़ने वाले असर का आकलन किया जाए।

 

*मांग नंबर 6: यमुना की 300 से अधिक सहायक नदियों के पुनर्जीवन की व्यापक योजना बने।*

यमुना छोटी-बड़ी सैकड़ों नदियों का तंत्र है। हिमालय से मैदानी क्षेत्रों तक इसकी अधिकांश सहायक नदियां जल दोहन, प्रदूषण और खनन से जूझ रही हैं। इनके संरक्षण, पुनर्जीवन और प्राकृतिक प्रवाह को बहाल करने के लिए समयबद्ध योजना बनाई जाए और प्रभावी ढंग से लागू की जाए।

 

*मांग नंबर 7: सीवेज और औद्योगिक प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था में बदलाव हो।*

यमुना एक्शन प्लान और नमामि गंगे के तहत 6,000 करोड़ रुपये खर्च होने और 100 से अधिक एसटीपी और 25 से अधिक सीईटीपी बनने के बावजूद नदी में सीवेज गिरना जारी है। केंद्रीय गृह सचिव की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय समिति के अनुसार, पांच राज्यों में प्रतिदिन 7,999 एमएलडी घरेलू सीवेज उत्पन्न होता है, जिसमें से 6,243.83 एमएलडी का ही शोधन होता है, 1,756 एमएलडी बिना शोधन के रह जाता है। बेसिन में 520 बड़े नाले नदी में गिरते हैं। यूपी में सीवेज शोधन की कमी 34 प्रतिशत और गैर-घरेलू अपशिष्ट जल के शोधन की कमी 63 प्रतिशत है। यहां लगभग 6,300 जल प्रदूषणकारी उद्योग हैं। इसलिए केवल नए संयंत्र बनाने के बजाय मौजूदा संयंत्रों की कार्यक्षमता और प्रदूषण मानकों के अनुपालन को सुनिश्चित किया जाए।

 

*मांग नंबर 8: यमुना शोध केंद्र, जिला यमुना समितियां और स्वतंत्र पुनरुत्थान आयोग गठित हों।*

यमुना के धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक महत्व को संरक्षित करने के लिए एक समर्पित यमुना नदी शोध केंद्र स्थापित किया जाए। जिला गंगा समितियों की तर्ज पर जिला यमुना समितियां गठित हों। साथ ही यमुना के जलागम, बांधों, सहायक नदियों, खनन, जलीय जीवन और लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को देखने के लिए स्वतंत्र नदी विशेषज्ञों की अगुवाई में यमुना पुनरुत्थान आयोग बनाया जाए।

 

बैठक में कहा गया कि यमुना का संकट केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि प्राकृतिक प्रवाह, सहायक नदियों का अस्तित्व, भूजल और संस्कृति से जुड़ा है।

 

कार्यक्रम का आयोजन गुरु वशिष्ठ मानव सर्वांगीण विकास सेवा समिति आगरा, यमुना जिए अभियान और यमुना नदी मित्र मंडलियों ने किया। इसमें पंडित अश्विनी कुमार मिश्र, मनीष राजपूत, राजीव सक्सेना, डा. संजय कुलश्रेष्ठ, भीम रावत सहित फतेहपुर, हमीरपुर, इटावा, बटेश्वर, मथुरा, यमुनानगर और देहरादून की मंडलियों के प्रतिनिधि शामिल हुए।