बजट के अभाव में बुझे 'लोकतंत्र के चौथे स्तंभ' के दीये: विज्ञापन भुगतान अटका, दीपावली नहीं मनाने को मजबूर छोटे मीडिया संस्थान

*दीपावली पर अंधेरे में 'लोकतंत्र का चौथा स्तंभ': सरकारी विज्ञापनों के भुगतान अधर में, छोटे मीडिया घरानों और पत्रकारों की दीवाली 'फीकी'*

*विशेष रिपोर्ट- कृष्णा नन्द शर्मा*

लखनऊ / प्रदेश डेस्क:

दीपावली के महापर्व में अब मात्र दो दिन शेष बचे हैं। चारों ओर जगमगाती रोशनी, मिठाइयों की खुशबू और त्योहार का उत्साह है, लेकिन लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का एक बड़ा हिस्सा आज गहरे आर्थिक संकट और निराशा के साये में जीने को मजबूर है। राज्य के छोटे व मध्यम मीडिया घरानों?विशेषकर साप्ताहिक एवं मासिक पत्र-पत्रिकाओं?के लिए इस बार की दीपावली की खुशियाँ फीकी नजर आ रही हैं।

वजह है?सूचना एवं जनसंपर्क विभाग (DIPR) द्वारा सरकारी सजावटी और त्यौहारों के विज्ञापनों का बकाया भुगतान (Payment) अब तक न होना।

कर्मचारियों की सैलरी अटकी, घरों में पसरा सन्नाटा

छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थान मुख्यतः शासन और प्रशासन द्वारा जारी किए जाने वाले विज्ञापनों पर निर्भर होते हैं। त्योहार के इस मौसम में जहाँ हर कोई अपने घर-परिवार के साथ खुशियाँ बांटने की तैयारी कर रहा है, वहीं विज्ञापन भुगतान न होने से छोटे मीडिया घरानों के पास अपने संवाददाताओं, संपादकीय टीम और प्रेस कर्मचारियों को दीपावली का बोनस व वेतन (Salary) देने तक के पैसे नहीं हैं।

पत्रकारों और संपादकों की स्थिति बेहद भावुक और चिंताजनक हो गई है। महीनों की मेहनत और दिन-रात की रिपोर्टिंग के बावजूद, जब त्योहार के समय हाथ खाली हों, तो खुशियाँ मनाना तो दूर, बुनियादी जरूरतें पूरी करना भी एक चुनौती बन गया है।

> "हम साल भर सरकार की योजनाओं और जन-सरोकार की खबरों को जनता तक पहुँचाते हैं। लेकिन जब हमारा हक और पारिश्रमिक मिलने का समय आता है, तो हमें केवल आश्वासन मिलता है। बिना बजट और बिना पेमेंट के हम अपने पत्रकारों के चेहरों पर खुशी कैसे लाएं?"

> ? एक स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्र के संपादक का दर्द

"बजट नहीं है" ? विभाग का रटा-रटाया जवाब!

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के आंतरिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, जब भी बकाये भुगतान को लेकर बात की जाती है, तो अधिकारी केवल एक ही रटा-रटाया जवाब देते हैं?"अभी बजट उपलब्ध नहीं है।"

सवाल यह उठता है कि जब सरकार विभिन्न आयोजनों और अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च करती है, तो राज्य की नींव माने जाने वाले छोटे और मध्यम समाचार पत्रों के न्यायसंगत बकाये के लिए बजट अचानक क्यों समाप्त हो जाता है? क्या छोटे मीडिया समूहों का अस्तित्व और उनसे जुड़े सैकड़ों पत्रकारों का भविष्य विभाग की प्राथमिकताओं में शामिल नहीं है?

2026 की दीवाली: उम्मीद और बेबसी के बीच झूलता पत्रकारिता जगत

आर्थिक तंगी के इस दौर में और वर्ष 2026 की इस दीपावली पर यह देखना वाकई दिलचस्प और संवेदनशील होगा कि क्या शासन-प्रशासन समय रहते जागता है या फिर इन छोटे मीडिया समूहों और उनसे जुड़े कलमकारों के घरों में इस बार दीवाली पर दीये की जगह बेबसी का अंधेरा ही छाया रहेगा।

अब सबकी निगाहें सरकार और सूचना विभाग के त्वरित फैसलों पर टिकी हैं?क्या त्योहार से ठीक पहले कोई राहत की किरण दिखाई देगी, या छोटे मीडिया घराने इस बार बिना दीवाली मनाए ही रहने पर बाध्य होंगे?