* पितृ पक्ष में नई चीजें खरीदने में कोई दोष नहीं - राजगुरु *

 

नई दिल्ली, 27 सितंबर:

श्री राजमाता झंडेवाला मंदिर, गोरख पार्क, शाहदरा में पितृ पक्ष के पावन अवसर पर आयोजित साप्ताहिक आध्यात्मिक सत्संग में स्वामी श्री राजेश्वरानंद राजगुरु जी महाराज ने भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि पितृ पक्ष को लेकर समाज में फैले भय, भ्रम और अंधविश्वासों से बाहर निकलने की आवश्यकता है। यह काल किसी डर का नहीं, बल्कि अपने दिवंगत पूर्वजों की पुण्य स्मृति, उनके प्रति आभार और कृतज्ञता व्यक्त करने का स्वर्णिम अवसर है।

राजगुरु जी महाराज ने अपने संदेश में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर प्रकाश डाला:

व्यस्तता के बीच अपनों को याद करने का अवसर: आधुनिकता की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में अक्सर हम अपने पूर्वजों की पुण्य स्मृति या धन्यवाद करने से वंचित रह जाते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने इन्हीं 15 दिनों को पूर्वजों की याद के लिए निर्धारित किया है ताकि हम पूर्वजों की पुण्य स्मृति को ताज़ा कर कुछ शुभकर्म करते हुए पूर्वजों द्वारा बताए मार्गदर्शन का स्मरण कर सकें।

पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता: आज हम जो कुछ भी हैं, वह अपने पूर्वजों के कारण ही हैं। उन्होंने हमें जीवन, संस्कार, मार्गदर्शन और वैभव दिया। उनके प्रति श्रद्धा न रखना सबसे बड़ा दोष है।

विस्तृत सामाजिक व पर्यावरणीय चेतना: श्राद्ध का अर्थ केवल तर्पण या भोजन कराना नहीं है। इस दौरान बनने वाले पकवानों से जरूरतमंदों, भिखारियों, पशुओं (गाय, कुत्ता) और पक्षियों (कौवे) को अन्न-जल अर्पित किया जाता है। साथ ही, पीपल की पूजा के माध्यम से प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जाता है।जोकि वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश देती हैं।

भ्रमों का खंडन (नई वस्तुओं की खरीदी): राजगुरु जी ने स्पष्ट किया कि इन दिनों में नई वस्तुएं न खरीदने का भ्रम पूरी तरह निराधार है। प्राचीन काल में बाजार दूर होने के कारण श्राद्ध कार्यों में पूरा दिन लगता था, जिससे लोग खरीदारी के लिए नहीं जा पाते थे। समय के साथ यह मात्र एक परंपरा या भ्रांति बन गई।यदि मन में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और समर्पण है, तो किसी भी वस्तु को खरीदने में कोई दोष नहीं है।

महिलाएं भी कर सकती हैं तर्पण: पितृ पक्ष के संबंध में एक महत्वपूर्ण बात यह रखी गई कि महिलाएं भी पूरी श्रद्धा के साथ श्राद्ध और तर्पण कर सकती हैं। त्रेता युग में माता सीता द्वारा राजा दशरथ का श्राद्ध किए जाने का प्रसंग इसका प्रमाण है। यदि घर में पुरुष उपलब्ध न हों या व्यवसाय के सिलसिले में बाहर हों, तो महिलाएं यह दायित्व पूरी पवित्रता से निभा सकती हैं।

दान का सही स्वरूप: ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ-साथ यदि योग्य ब्राह्मण न मिलें, तो किसी जरूरतमंद को, भंडारे में अथवा सूखा अनाज, वस्त्र व जल दान के रूप में सहायता दी जा सकती है। जरूरत मंद की सेवा ही वास्तव में पितरों को समर्पित सच्ची श्रद्धांजलि है।

राजगुरु जी महाराज ने अंत में आह्वान किया कि किसी भी भ्रम या संकोच में पड़े बिना, अपने पितरों की स्मृति को ताजा करते हुए पूरी श्रद्धा और समर्पण भाव के साथ पितृ पक्ष मनाएं।

सदगुरु राजदरबार के प्रबंधक राम वोहरा ने बताया कि आगामी 10 अक्टूबर को शनि अमावस्या एवं पितृ अमावस्या का संयोग वर्षों के बाद आया है।इस दिन सर्व पितृ यज्ञ का आयोजन किया जाएगा जिसमें भूले बिसरे पितरों के साथ उन लोगों के लिए श्रद्धांजलि तर्पण किया जाएगा जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में प्राण न्योछावर कर दिए। उन साधु संतों एवं समाज सेवियों के लिए जिन्होंने राष्ट्र धर्म समाज के लिए जीवन व्यतीत किया आज उनके पश्चात उनको याद करने वाला कोई नहीं एवं प्राकृतिक आपदा में मारे गए लोगों के लिए यज्ञ में आहुतियां अर्पित करते हुए तर्पण के बाद ब्रह्मभोज एवं भंडारा प्रसाद वितरण किया जाएगा।

राम वोहरा 9212315006