मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक घोषित न करना आदिवासी समाज की अस्मिता, ऐतिहासिक बलिदान और गौरवशाली परंपरा का अपमान : पूर्व सांसद भगोरा

संवाददाता - संतोष व्यास

डूंगरपुर। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के पूर्व राष्ट्रीय सचिव एवं बांसवाड़ा-डूंगरपुर के पूर्व सांसद ताराचंद भगोरा ने मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा न दिए जाने पर केंद्र सरकार के प्रति कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है। उन्होंने इसे आदिवासी समाज की अस्मिता, उनके ऐतिहासिक बलिदान और गौरवशाली परंपरा का सीधा अपमान करार दिया। भगोरा ने कहा कि चुनावों के दौरान आदिवासी वर्ग से बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही उन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।

पूर्व सांसद ने याद दिलाया कि वर्ष 2022 में स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मानगढ़ धाम के अपने दौरे के दौरान इसे राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने का आश्वासन दिया था। हालांकि, वर्षों बीत जाने के बाद भी यह वादा अधूरा ही है। उन्होंने कहा कि मानगढ़ धाम केवल एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि देश की स्वतंत्रता के लिए आदिवासियों के अदम्य साहस और शौर्य का प्रतीक है।

- आदिवासियों का जलियांवाला बाग है मानगढ़

मानगढ़ के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हुए भगोरा ने कहा कि इसे 'आदिवासियों का जलियांवाला बाग' माना जाता है। 17 नवंबर 1913 को महान समाज सुधारक गोविंद गुरु के नेतृत्व में एकत्रित हुए निष्पाप और शांतिपूर्ण भील आदिवासियों पर ब्रिटिश हुकूमत ने बर्बरतापूर्वक गोलियां चलाई थीं, जिसमें लगभग 1500 आदिवासी देश के लिए शहीद हो गए थे।

- पर्यटन और विकास के अवसरों पर भी लगा ग्रहण

भगोरा ने कहा कि मानगढ़ धाम को राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा मिलने से न केवल शहीदों को यथोचित राष्ट्रीय सम्मान मिलता, बल्कि राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के सीमावर्ती आदिवासी क्षेत्रों में पर्यटन, बुनियादी ढांचे और रोजगार के नए द्वार भी खुलते। केंद्र सरकार की इस उपेक्षा ने पूरे आदिवासी बहुल क्षेत्र की भावनाओं को आहत किया है। उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि वह इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारते हुए अपनी पूर्व घोषणा पर तत्काल पुनर्विचार करे और जनभावनाओं का सम्मान करते हुए मानगढ़ धाम को अविलंब राष्ट्रीय स्मारक का दर्जा प्रदान करे।