पीताम्बर देव जू महाराज की वाणी का संत विद्वानों ने किया विमोचन

भक्ति और श्रद्धा के साथ मनाया गया स्वामी नरहरि देवजी महाराज का 399वाँ प्राकट्य महोत्सव

वृंदावन । सप्त देवालयों की पावन धरा और राधा-कृष्ण की लीला स्थली वृंदावन में 'हरिदासीय संप्रदाय' की गौरवशाली परंपरा के अंतर्गत श्रीस्वामी नरहरि देवजी महाराज का 399वाँ प्राकट्य महोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास और धूमधाम के साथ मनाया गया। परिक्रमा मार्ग स्थित 'हरिदासीय राधाप्रसाद सेवा ट्रस्ट' एवं 'श्री हरिदासीय रसोपासना पीठ ललित कुंज' के तत्वावधान में आयोजित इस महोत्सव में देश के विभिन्न प्रांतों से आए भक्तों और संतों ने अपनी हाजिरी लगाई।

मंगलाचरण और समाज गायन से हुआ शुभारंभ

जानकारी देते हुए महंत मोहिनी बिहारी शरण महाराज ने बताया कि उत्सव का शुभारंभ ब्रह्ममुहूर्त में ठाकुर श्रीराधा ललित बिहारीजी महाराज की दिव्य मंगलाचरण आरती के साथ हुआ। पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी राधाप्रसाद देव जू महाराज के पावन सानिध्य में समूचा वातावरण 'बांके बिहारी' और 'स्वामी हरिदास' के जयकारों से गुंजायमान हो उठा। इसके पश्चात संप्रदाय की प्राचीन परंपरा के अनुसार 'समाज गायन' का आयोजन किया गया, जिसमें विद्वान गायकों ने मधुर भजनों और पदों के माध्यम से स्वामी नरहरि देवजी महाराज के गुणों का बखान किया। भक्ति के पदों को सुनकर उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर होकर नृत्य करने लगे।

जगन्नाथ जी के अवतार थे स्वामी नरहरि देवजी महाराज

इस शुभ अवसर पर भक्तों को संबोधित करते हुए महामंडलेश्वर स्वामी राधाप्रसाद देव महाराज ने स्वामी नरहरि देवजी के जीवन और उनके चमत्कारों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि स्वामी नरहरि देवजी साक्षात भगवान जगन्नाथजी के अवतार थे। उनका प्राकट्य जगत के कल्याण और भक्ति मार्ग को सुलभ बनाने के लिए हुआ था। स्वामी जी ने न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन किया, बल्कि पीड़ित मानवता की सेवा भी की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार महाराज जी ने एक वणिक (व्यापारी) के असाध्य कोढ़ का निवारण कर उसे नया जीवन प्रदान किया था। उनकी करुणा और शक्ति के किस्से आज भी भक्तों के बीच अटूट श्रद्धा का केंद्र हैं।

सनकादिक मुनियों की तपस्थली और दाल पीसने का दिव्य चमत्कार

स्वामी राधाप्रसाद देव महाराज ने महाराज जी के जीवन का एक अत्यंत रोचक और प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि एक बार महंत मुरारी दासजी अपने चार सौ शिष्यों की विशाल जमात के साथ स्वामी जी के पास पधारे। यह दल छह महीने तक मऊ भोज की दशान नदी के किनारे महाराज जी के स्थान पर रुका, जिसे सनकादिक मुनियों की प्राचीन तपस्थली माना जाता है।एक दिन स्वामी नरहरि देवजी के मन में संतों को 'राम चकला' (एक विशेष व्यंजन) खिलाने का विचार आया। इसके लिए शिष्यों ने दस मन दाल भिगो दी। इतनी विशाल मात्रा में दाल देखकर शिष्य असमंजस में पड़ गए और महाराज जी से पूछा कि गुरुदेव, इतनी दाल हाथों से कैसे पिसेगी? तब महाराज जी ने मुस्कराते हुए शिष्यों को केवल भजन करने की आज्ञा दी और आश्वस्त किया कि काम समय पर पूर्ण हो जाएगा। कहा जाता है कि भक्ति के प्रभाव से स्वयं चारों भाई सनकादिक मुनि वहाँ प्रकट हुए और मात्र चार घड़ी के भीतर पूरी दस मन दाल पीसकर अंतर्ध्यान हो गए। महाराज जी के जीवन की ऐसी अनगिनत कथाएँ उनके पूर्ण सिद्ध पुरुष होने का प्रमाण देती हैं।

हरिदासीय संप्रदाय के आचार्य पीतांबर देव जू महाराज की वाणी का हुआ विमोचन

संप्रदाय के परम पूज्य आचार्य पीतांबर देव जू महाराज की दिव्य वाणी (पदों और रचनाओं) का विधिवत विमोचन किया गया। इस अवसर पर संप्रदाय के संत, विद्वान और भक्त भारी संख्या में उपस्थित रहे। विमोचन समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आचार्य पीतांबर देव महाराज की वाणी केवल शब्द नहीं, बल्कि साक्षात भक्ति का रस है। यह साहित्य स्वामी हरिदास जी की सुमधुर उपासना पद्धति और निधिवन राज के निकुंज रहस्यों को आम भक्तों तक सरल भाषा में पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम बनेगा। विमोचित पुस्तक में स्वामी हरिदासीय पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर राधा प्रसाद देव जू महाराज द्वारा रचित उन भजनों और पदों का संकलन है, जो श्री राधा-कृष्ण की युगल छवि और वृंदावन की महिमा का गुणगान करते हैं। संप्रदाय के अनुयायियों के अनुसार, यह वाणी साधकों के लिए भजन मार्ग में मार्गदर्शक सिद्ध होगी। कार्यक्रम के अंत में बधाई गायन हुआ और संतों का सम्मान किया गया। इस प्रकाशन को ब्रज साहित्य के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

संतों की गरिमामयी उपस्थिति

इस महोत्सव में ब्रज के प्रमुख संतों ने भी शिरकत की। कार्यक्रम के दौरान महामंडलेश्वर सत्यानन्द सरस्वती अधिकारी गुरु महाराज, महंत रामदास, महंत अचल दास, महंत श्याम बाबा, वैष्णव दास, नवलसखी दास, अनमोल शास्त्री, मनोज मोहन शास्त्री, मृदुलकांत शास्त्री, रूपेश शरण, आचार्य बद्रीश, सूरज मुख्य रूप से उपस्थित रहे। सभी संतों का स्वागत पीठाधीश्वर द्वारा माला पहनाकर और प्रसादी भेंट कर किया गया।

भंडारे के साथ हुआ समापन

महोत्सव के अंत में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में ब्रजवासियों, संतों और श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने बताया कि स्वामी नरहरि देवजी महाराज की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यह पीठ निरंतर सेवा कार्यों और रसो उपासना के प्रचार-प्रसार में जुटी हुई है। शाम को ललित कुंज के परिसर में भव्य दीपोत्सव और फूलों की होली के साथ उत्सव का विधिपूर्वक समापन हुआ।