अन्नप्राशन, शिशु के समग्र विकास का सनातन आधार है : डॉ.जितेन्द्र उपाध्याय

सूरापुर, सुल्तानपुर : सनातन धर्म (हिंदू धर्म) में अन्नप्राशन संस्कार 16 प्रमुख संस्कारों में से सातवाँ महत्वपूर्ण संस्कार है। यह शिशु के जीवन में एक पवित्र मील का पत्थर है, जिसमें माता के दूध के अतिरिक्त पहली बार ठोस अन्न (सामान्यतः चावल की खीर या हविष्यान्न) ग्रहण कराया जाता है। संस्कृत में "अन्न" का अर्थ भोजन या अनाज और "प्राशन" का अर्थ ग्रहण करना है, अतः यह "अन्न ग्रहण" का संस्कार है। सूरापुर परिक्षेत्र के खेतापुर निवासी ओमप्रकाश पाण्डेय की पुत्री सोनम पाण्डेय पत्नी तरूण उपाध्याय (निवासी कटनी मध्य प्रदेश) के पुत्र राघव के अन्न प्रासन संस्कार के अवसर पर संत तुलसीदास पीजी कॉलेज कादीपुर के मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ जितेन्द्र कुमार उपाध्याय ने बताया कि सनातन शास्त्रों (गृह्यसूत्र, स्मृतियाँ, पुराण आदि) में अन्न को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। भगवद्गीता में कहा गया हैकि"अन्नाद् भवन्ति भूतानि" अर्थात् समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न को ही प्राण कहा गया है। यज्ञ से बचा हुआ अन्न ही सनातन ब्रह्म की प्राप्ति कराता है।अन्नप्राशन संस्कार का महात्म्य यह है कि शिशु को पहला अन्न यज्ञीय वातावरण, वैदिक मंत्रोच्चारण और शुभ मुहूर्त में दिया जाता है। इससे शिशु को शुद्ध, सात्विक और पौष्टिक अन्न ग्रहण की आदत पड़ती है। शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए दिव्य तेज, बल, बुद्धि, दीर्घायु और सद्गुणों की प्राप्ति होती है। अन्न को केवल भोजन नहीं, बल्कि देवप्रसाद और ब्रह्म का अंश मानकर ग्रहण करने की संस्कारित भावना जागृत होती है। इससे शुद्ध अन्न से शरीर स्वस्थ रहता है और स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। इस संस्कार से शिशु की बुद्धि, वाणी और तेजस्विता बढ़ती है। यह उत्सव परिवार को एकजुट करता है। इसमें मित्र और गुरुजन शिशु को आशीर्वाद देते हैं। इससे सनातन संस्कृति की निरंतरता बनी रहती है। इस अवसर पर राहुल तिवारी लक्ष्मणपुर (कोटिया) कादीपुर की मण्डली द्वारा रामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड की सांस्कृतिक गायन किया गया। जिसमें, पंण्डित विनोद पाण्डेय,विनय पाण्डेय, आदि सैकड़ों सम्मानित लोग उपस्थित रहे।