_आरटीआई पर भी जवाब नहीं, भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति सवालों के घेरे में_

जिला प्रशासन की जाँच बेअसर, करोड़ों के पंचायत घोटाले पर बिलग्राम प्रशासन मौन

_आरटीआई पर भी जवाब नहीं, भ्रष्टाचार पर ?जीरो टॉलरेंस? नीति सवालों के घेरे में_


हरदोई जिले के बिलग्राम ब्लॉक की ग्राम पंचायत कटरी छिबरामऊ आज विकास की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला बन चुकी है। यहाँ सरकारी धन की ऐसी निर्लज्ज लूट हुई कि आंकड़े भी शर्मसार हो जाएँ, लेकिन हैरानी यह कि न तो जाँच आगे बढ़ रही है और न ही किसी जिम्मेदार पर कार्यवाही हो रही है। बीते पाँच वर्षों के तथाकथित ?विकास कार्य? अब सवाल नहीं, बल्कि प्रशासनिक संरक्षण और मिलीभगत का जीता-जागता सबूत बन चुके हैं। ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान पर सदस्यों के फर्जी हस्ताक्षर, कागजी विकास और खुली लूट बंदरबांट के गंभीर आरोप लगाए। रजिस्ट्री से लेकर ऑनलाइन पोर्टल और अंततः लोक आयुक्त उत्तर प्रदेश तक 39 बिंदुओं पर शिकायतें भेजी गईं, लेकिन नतीजा शून्य। आरोप है कि लोक आयुक्त जाँच में नामित अधिकारी पंचायत में झाँकने तक नहीं पहुँचे और राजनीतिक दबाव व निजी हितों में पूरा मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। यदि यही जाँच है, तो लोक आयुक्त की साख का क्या मतलब रह जाता है? मनरेगा के नाम पर कच्चे-पक्के कार्यों में लगभग 1 करोड़ 15 लाख रुपये की बंदरबांट केवल फाइलों में दर्ज है। जमीनी सच्चाई यह है कि न काम दिखता है, न गुणवत्ता। नाली-नाला, इंटरलॉकिंग, सीसी रोड, हैंडपंप मरम्मत, स्ट्रीट लाइट, पोस्टर पेंटिंग और ग्रामसभा बैठकों जैसे कार्यों में करीब 36 लाख रुपये और हजम कर लिए गए। दो महीने से जाँच फाइलों को पेंडिंग में डालना क्या आरोपियों को बचाने की खुली साजिश नहीं? सबसे शर्मनाक स्थिति तब सामने आई जब आरटीआई के तहत जानकारी माँगी गई। संबंधित अधिकारियों ने जवाब देना भी जरूरी नहीं समझा। क्या अब जन सूचना अधिकार अधिनियम भी अफसरशाही की तिजोरी में कैद हो चुका है? क्या योगी सरकार की ?भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस? नीति हरदोई पहुँचते ही दम तोड़ देती है?लगातार खबरें छपने के बावजूद जिला प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। आखिर किसके संरक्षण में यह खुली लूट जारी है? यदि अब भी सख्त कार्यवाही नहीं हुई, तो यह साफ संदेश होगा कि पंचायतों में भ्रष्टाचार करने वालों के लिए कानून सिर्फ एक मज़ाक बनकर रह गया है।