CMO कार्यालय की योजनाओं पर सवाल, ACMO की भूमिका भी घेरे में

चंदौली। जनपद में स्वास्थ्य योजनाओं की हकीकत और कागजी दावों के बीच बढ़ता फासला अब CMO कार्यालय के साथ-साथ ACMO (अपरमुख्य चिकित्सा अधिकारी) की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), दवा वितरण, मातृ-शिशु स्वास्थ्य और आउटसोर्स कर्मचारियों से जुड़ी योजनाएं फाइलों में भले ही सफल दिखाई जा रही हों, लेकिन ज़मीनी स्तर पर हालात इसके उलट बताए जा रहे हैं।

नियमों के अनुसार ACMO की जिम्मेदारी होती है कि वह योजनाओं के मैदानी क्रियान्वयन की सत्य रिपोर्ट, दवा वितरण की वास्तविक स्थिति और कर्मचारियों की उपस्थिति का प्रमाणन करे। सवाल यह है कि जब प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर दवाओं की कमी, स्टाफ की अनुपस्थिति और योजनाओं का अधूरा लाभ सामने आ रहा है, तो ACMO द्वारा भेजी जा रही सकारात्मक रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की जा रही है?

सूत्रों का कहना है कि CMO कार्यालय की अधिकांश योजनागत फाइलें ACMO स्तर की रिपोर्टिंग और सत्यापन के बाद ही आगे बढ़ती हैं। ऐसे में यदि अनियमितताएं सामने आ रही हैं, तो केवल CMO ही नहीं, बल्कि ACMO की चुप्पी भी संदेह के घेरे में आती है। क्या यह लापरवाही है या फिर योजनाओं की खामियों पर जानबूझकर पर्दा डाला जा रहा है?

उत्तर प्रदेश सरकारी वित्तीय नियमों और NHM गाइडलाइन के तहत गलत या भ्रामक रिपोर्टिंग गंभीर कदाचार की श्रेणी में आती है। अब जरूरत है कि दवा खरीद, NHM फंड उपयोग और योजनाओं की स्वतंत्र ऑडिट व जांच कराई जाए, ताकि यह साफ हो सके कि स्वास्थ्य योजनाएं कागज़ों में सफल क्यों दिख रही हैं और ज़मीन पर क्यों फेल।