क्या हम साथ चल रहे हैं?

क्या हम साथ चल रहे हैं?

भारत का 77वां गणतंत्र देखने का अवसर नहीं, बल्कि वह ऐतिहासिक दिन है जब भारत ने गुलामी की जंजीरें तोड़कर केवल आजादी ही नहीं, बल्कि स्वयं के शासन का संकल्प लिया। यही वह क्षण था जब राष्ट्र ने तय किया कि उसका भविष्य संविधान, न्याय और नागरिक चेतना से संचालित होगा। 26 जनवरी कोई साधारण उत्सव नहीं, बल्कि वह दिन है जब भारत अपने विवेक के सामने खड़ा होकर स्वयं से पूछता है कि क्या उसने अपने गणतंत्र को केवल स्मरण तक सीमित रखा है या उसे अपने जीवन का संस्कार बनाया है। यह दिन तिरंगे की गरिमा से पहले नागरिक के चरित्र और कर्तव्यबोध की परीक्षा लेता है। यह हमें याद दिलाता है कि आजादी अतीत की उपलब्धि नहीं, बल्कि वर्तमान की सतत जिम्मेदारी है, क्योंकि राष्ट्र का भविष्य शब्दों से नहीं, बल्कि हमारे आचरण और कर्म से निर्मित होता है।

1950 में संविधान के लागू होने के साथ भारत ने यह दृढ़ संकल्प लिया था कि यह राष्ट्र शक्ति के दबाव या भय के आधार पर नहीं, बल्कि न्याय, समानता और विधि के सिद्धांतों पर चलेगा। डॉ. भीमराव अंबेडकर की चेतावनी आज भी उतनी ही प्रखर है कि संविधान की सार्थकता उसके अनुच्छेदों में नहीं, बल्कि उसे लागू करने वालों की नैतिकता में निहित होती है। सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद मूल प्रश्न यह नहीं रह गया है कि हमारे पास अधिकार हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम उन अधिकारों की गरिमा को निभाने वाले उत्तरदायी नागरिक बन पाए हैं।

भ्रष्टाचार आज भी विकास पथ की सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। यह केवल प्रशासनिक कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति का रूप ले चुका है। जब नियमों को तोड़ना सामान्य व्यवहार बन जाता है, तब नैतिकता कमजोर पड़ने लगती है। इसके साथ ही जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के नाम पर खींची गई रेखाएँ सामाजिक एकता को क्षति पहुँचाती हैं। विविधता भारत की पहचान है, लेकिन जब वही विभाजन का कारण बन जाए, तो गणतंत्र की नींव डगमगाने लगती है।

गणतंत्र दिवस हमें यह गहरी समझ देता है कि अधिकार और कर्तव्य एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहारे टिके हैं। कर्तव्य के बिना अधिकार अर्थहीन और कमजोर हो जाते हैं। प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह ईमानदारी, अनुशासन और सामाजिक सद्भाव को अपने आचरण का आधार बनाए। नफरत और अफवाहों के स्थान पर संवाद, सहिष्णुता और समझ को बढ़ावा देना ही सच्ची देशभक्ति का परिचय है। समस्याओं से मुंह मोड़ने के बजाय समाधान खोजने की सोच विकसित करना समय की माँग है।

आज इस गणतंत्र दिवस पर हमें यह संकल्प लेना होगा कि हम केवल आलोचना करने वाले नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागी बनेंगे। हम विभाजन की नहीं, एकता और भाईचारे की राह चुनेंगे।