*आईएससी-फिक्की स्वच्छता पुरस्कार ग्रे वॉटर प्रबंधन में टीकमगढ़ राष्ट्रीय स्तर पर विजेता*

आईएससी-फिक्की स्वच्छता पुरस्कार में ग्रे वॉटर प्रबंधन श्रेणी में मिला सम्मान, नई दिल्ली में कलेक्टर श्री विवेक श्रोत्रिय ने टीम के साथ ग्रहण किया पुरस्कार*

*टीकमगढ़, 15 सितंबर 2026/* गांवों की गलियों में बहता गंदा पानी, कीचड़ और जलभराव की समस्या को दूर करने के लिए टीकमगढ़ जिले की ग्राम पंचायतों द्वारा किए गए अभिनव प्रयास और विस्तार को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। आईएससी-फिक्की स्वच्छता पुरस्कार में टीकमगढ़ को ग्रे वॉटर प्रबंधन श्रेणी में विजेता घोषित किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में टीकमगढ़ कलेक्टर श्री विवेक श्रोत्रिय, तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत श्री नवीत कुमार धुर्वे और जिला समन्वयक जिला पंचायत श्री मनीष जैन ने पुरस्कार ग्रहण किया।

*एक गांव से शुरू हुआ प्रयोग, दो साल में 225 गांवों तक पहुंचा*

टीकमगढ़ जिले में भूमिगत जल निकासी की यह पहल चंद्रपुरा गांव से शुरू हुई थी। इसके सकारात्मक परिणामों को देखते हुए जिला प्रशासन ने इसे व्यवस्थित योजना के साथ जिले के अन्य गांवों में विस्तार देने की कार्ययोजना तैयार की। तकनीकी मार्गदर्शन, चरणबद्ध कार्ययोजना और उपलब्ध वित्तीय संसाधनों के समुचित उपयोग के साथ पिछले दो वर्षों में यह व्यवस्था 225 गांवों तक विस्तारित की जा चुकी है।

जिला प्रशासन की ठोस योजना, तकनीकी सहयोग और पंचम वित्त आयोग से उपलब्ध वित्तीय संसाधनों के उपयोग से ग्राम पंचायतों में यह व्यवस्था विकसित की जा रही है। इसका परिणाम अब गांवों की गलियों और सार्वजनिक स्थानों की बदली हुई तस्वीर के रूप में दिखाई दे रहा है। खुले में बहते गंदे पानी, कीचड़ और जलभराव से राहत के साथ गांवों का परिवेश अधिक स्वच्छ, व्यवस्थित और सुविधाजनक बन रहा है।

*घर के बाहर चैंबर, जमीन के नीचे पाइप से निकासी*

इस व्यवस्था के तहत घरों से निकलने वाले स्नान, कपड़े धोने और रसोई आदि के पानी को खुले में बहने से रोकने के लिए घरों के बाहर सिल्ट चैम्बर बनाए जाते हैं। इन चैंबरों को करीब 8 इंच व्यास के पाइप से आपस में जोड़ा जाता है। पाइपों के माध्यम से पानी को भूमिगत रूप से गांव के अंतिम बिंदु तक पहुंचाया जाता है, जहां सोख्ता गड्ढे के माध्यम से पानी का निस्तारण किया जाता है।

चैंबर में गाद और ठोस पदार्थों को रोकने की व्यवस्था होने से पाइपों में रुकावट की संभावना कम होती है। इससे गलियों में खुले रूप से गंदा पानी बहने, कीचड़ और जलभराव की समस्या में कमी आती है।

*गांव की गलियां बनीं साफ और व्यवस्थित*

अंडरग्राउंड जल निकासी व्यवस्था का असर गांवों के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई दे रहा है। गलियों में गंदे पानी और कीचड़ की समस्या कम होने से आवागमन आसान हुआ है। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए भी गांव की गलियां अधिक सुविधाजनक हुई हैं।

*ग्रामीण इस बदलाव को इन शब्दों में व्यक्त कर रहे हैं?*

*?हमारे गांव की गलियां अब आंगन में बदल गई हैं।?*

*योजना, तकनीक और वित्तीय संसाधनों का संगम*

इस पहल की सफलता के पीछे जिला प्रशासन की ठोस योजना, तकनीकी सहयोग और वित्तीय संसाधनों का बेहतर उपयोग महत्वपूर्ण रहा है। ग्राम पंचायत स्तर पर उपलब्ध निधियों के साथ पंचम वित्त आयोग से प्राप्त संसाधनों का उपयोग करते हुए स्थानीय जरूरत के अनुसार चैंबर, भूमिगत पाइपलाइन और सोख्ता गड्ढों का निर्माण किया जा रहा है।

एक छोटे से गांव में शुरू हुआ प्रयोग अब 225 गांवों में आकार ले चुका है। इस विस्तार ने यह दिखाया है कि किसी स्थानीय नवाचार को यदि स्पष्ट योजना, नेतृत्व, तकनीकी मार्गदर्शन, और ग्राम पंचायतों की सक्रिय भागीदारी मिले, तो वह व्यापक ग्रामीण परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।

*यह ग्राम पंचायतों के संकल्प, विश्वास और प्रयासों का परिणाम : कलेक्टर श्री श्रोत्रिय*

कलेक्टर श्री विवेक श्रोत्रिय ने कहा कि ?यह पुरस्कार टीकमगढ़ जिले की ग्राम पंचायतों के संकल्प, विश्वास और प्रयासों का परिणाम है। जिले ने देश के ग्रामों को गंदे पानी से विमुक्त करने का एक मॉडल सामने रखा है।?

उन्होंने कहा कि चंद्रपुरा से शुरू हुई यह पहल अब 225 गांवों तक पहुंच चुकी है। यह केवल भूमिगत जल निकासी व्यवस्था बनाने का काम नहीं है, बल्कि गांवों की जीवन गुणवत्ता और ग्रामीण परिवेश की तस्वीर बदलने का अभियान है।

उन्होंने कहा कि जिला प्रशासन का प्रयास है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप इस मॉडल को और प्रभावी बनाया जाए तथा इसके संचालन और रखरखाव पर भी निरंतर ध्यान दिया जाए।

*निर्माण नहीं, परिवर्तन ही सच्ची उपलब्धि*

टीकमगढ़ की ग्राम पंचायतों ने स्थानीय समस्या का स्थानीय समाधान तलाशते हुए गंदे पानी के प्रबंधन की दिशा में एक सरल और व्यावहारिक व्यवस्था विकसित की है। एक गाँव से शुरू हुई पहल का दो वर्षों में 225 गांवों तक विस्तार इस बात का उदाहरण है कि नियोजित प्रशासकीय प्रयास, तकनीकी सहयोग और वित्तीय संसाधनों के समन्वय से ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।