एमबीबीएस के बोर्ड का खेल? अस्पताल अंदर से कौन चला रहा है!

एमबीबीएस के बोर्ड का खेल? अस्पताल अंदर से कौन चला रहा है!

बोर्ड पर डॉक्टर का नाम, लेकिन पंजीयन का पता नहीं_टड़ियावां में निजी अस्पतालों की व्यवस्था पर गंभीर सवाल, स्थानीय सीएचसी से लेकर स्वास्थ्य विभाग तक की चुप्पी पर उठ रही उंगलियां

#हरदोई

टड़ियावां क्षेत्र में निजी अस्पतालों के संचालन को लेकर एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि कुछ अस्पतालों के बाहर एमबीबीएस चिकित्सकों के नाम वाले बड़े-बड़े बोर्ड तो नजर आते हैं, लेकिन अस्पताल के संचालन से संबंधित आवश्यक पंजीयन और अन्य वैधानिक विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट दिखाई नहीं देते।

टड़ियावां इंडेन गैस एजेंसी के सामने स्थित एक निजी अस्पताल की तस्वीर भी इसी सवाल को जन्म देती है। अस्पताल के मुख्य द्वार पर लगे बोर्ड में एमबीबीएस चिकित्सकों के नाम तो प्रदर्शित हैं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग से संबंधित पंजीयन/रजिस्ट्रेशन का विवरण स्पष्ट रूप से नजर नहीं आता। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या केवल डॉक्टर का नाम बोर्ड पर लिख देने भर से अस्पताल का संचालन वैध हो जाता है?

सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि अस्पतालों में मरीजों का उपचार हो रहा है तो वहां तैनात चिकित्सकों, पैरामेडिकल स्टाफ, अस्पताल के पंजीयन और उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का विभागीय सत्यापन कब हुआ? यदि पंजीयन मौजूद है तो उसे सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित क्यों नहीं किया गया? और यदि नहीं है तो जिम्मेदार विभाग की नजर इन संस्थानों तक आखिर कब पहुंचेगी?

क्षेत्र में मरीजों और तीमारदारों से कथित बदसलूकी तथा उपचार के नाम पर मनमानी वसूली की शिकायतों के बीच स्वास्थ्य विभाग की कथित निष्क्रियता भी चर्चा का विषय बनी हुई है। सवाल सीधा है_जांच की जिम्मेदारी किसकी है और कार्रवाई के लिए किसी बड़े हादसे का इंतजार क्यों?

कुर्सी पर बैठे जिम्मेदारों से सवाल

स्थानीय सीएचसी और स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को क्षेत्र में संचालित निजी अस्पतालों की जांच कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि कौन से अस्पताल वैध पंजीयन के साथ संचालित हो रहे हैं और किनके खिलाफ कार्रवाई की आवश्यकता है।

मरीज की जिंदगी कोई प्रयोगशाला नहीं है। अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो जांच के बाद तस्वीर साफ हो जाएगी, लेकिन अगर नियमों की आड़ में केवल एमबीबीएस के नाम का बोर्ड और अंदर अनधिकृत इलाज चल रहा है, तो फिर जिम्मेदारों की चुप्पी खुद कई सवाल खड़े करती है।

 

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